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अमांत और पूर्णिमांत हिंदू चंद्र पंचांग पद्धतियों को चंद्र कलाओं के साथ दर्शाने वाला चित्रण

अमांत बनाम पूर्णिमांत: हिंदू चंद्र मास पद्धतियों की संपूर्ण व्याख्या

6 मिनट
आकांक्षा सोनी
वैदिक ज्ञान

यदि आपने कभी गौर किया हो कि एक ही हिंदू त्योहार उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय पंचांग में अलग-अलग महीनों के नाम से दिखाई देता है, तो आप वास्तव में अमांत-पूर्णिमांत के अंतर को देख रहे हैं। यह कोई त्रुटि नहीं है — ये चंद्र मास मापने की दो समान रूप से मान्य, शास्त्र-सम्मत पद्धतियां हैं।

हिंदू चंद्र मास क्या है?

हिंदू पंचांग — जिसे पंचांग (पञ्चाङ्ग) कहा जाता है — एक चंद्र-सूर्य (lunisolar) पंचांग है। प्रत्येक चंद्र मास लगभग 29.5 दिन का होता है, जो चंद्रमा की एक कला से अगली कला तक मापा जाता है। दोनों पद्धतियों में अंतर यह है कि चंद्रमा की कौन सी कला माह के अंत को चिह्नित करती है

प्रत्येक चंद्र मास के दो पक्ष होते हैं:

  • शुक्ल पक्ष (शुक्ल पक्ष): उजला पखवाड़ा — बढ़ता चंद्रमा (अमावस्या → पूर्णिमा)।
  • कृष्ण पक्ष (कृष्ण पक्ष): अंधेरा पखवाड़ा — घटता चंद्रमा (पूर्णिमा → अमावस्या)।

प्रश्न यह है: क्या माह अमावस्या पर समाप्त होता है या पूर्णिमा पर?

अमांत पद्धति (अमावस्यान्त)

अमांत (अमान्त) — जिसे अमावस्यान्त या मुख्यमान भी कहते हैं — वह चंद्र पद्धति है जिसमें माह अमावस्या (नवचंद्र दिवस) पर समाप्त होता है।

  • माह शुक्ल पक्ष प्रतिपदा (अमावस्या के अगले दिन) से शुरू होता है।
  • शुक्ल पक्ष पहले आता है, उसके बाद कृष्ण पक्ष।
  • माह अगली अमावस्या पर समाप्त होता है।

व्युत्पत्ति: अमा (अमा) = अमावस्या + अन्त* (अन्त) = समाप्ति। अर्थात्, "अमावस्या पर समाप्त होने वाला।"

अमांत पद्धति का पालन करने वाले राज्य

गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा के कुछ भाग। शालिवाहन शक पंचांग (78 ई. में स्थापित), जो भारतीय राष्ट्रीय पंचांग का आधार है, अमांत पद्धति का अनुसरण करता है।

पूर्णिमांत पद्धति (पूर्णिमान्त)

पूर्णिमांत (पूर्णिमान्त) — जिसे पूर्णिमान्त या गौणितमान भी कहते हैं — वह चंद्र पद्धति है जिसमें माह पूर्णिमा (पूर्ण चंद्र दिवस) पर समाप्त होता है।

  • माह कृष्ण पक्ष प्रतिपदा (पूर्णिमा के अगले दिन) से शुरू होता है।
  • कृष्ण पक्ष पहले आता है, उसके बाद शुक्ल पक्ष।
  • माह अगली पूर्णिमा पर समाप्त होता है।

व्युत्पत्ति: पूर्णिमा (पूर्णिमा) = पूर्ण चंद्र + अन्त* (अन्त) = समाप्ति। अर्थात्, "पूर्णिमा पर समाप्त होने वाला।"

पूर्णिमांत पद्धति का पालन करने वाले राज्य

बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश। विक्रम संवत पंचांग पूर्णिमांत पद्धति का अनुसरण करता है।

मूल अंतर: एक ही तिथि, अलग माह का नाम

यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है: दोनों पद्धतियों में एक ही तिथि (चंद्र दिवस) एक ही कैलेंडर तारीख पर होती है। किसी भी माह का शुक्ल पक्ष दोनों पद्धतियों में समान होता है। अंतर कृष्ण पक्ष में आता है — एक ही कृष्ण पक्ष के दिनों का माह का नाम अलग होता है।

यह कैसे काम करता है:

  • अमांत पद्धति में, एक माह में: शुक्ल पक्ष → कृष्ण पक्ष (दोनों एक ही माह के नाम से)।
  • पूर्णिमांत पद्धति में, एक माह में: कृष्ण पक्ष → शुक्ल पक्ष (कृष्ण पक्ष को अमांत की तुलना में अगले* माह का नाम मिलता है)।

व्यावहारिक उदाहरण: महा शिवरात्रि

महा शिवरात्रि कृष्ण पक्ष चतुर्दशी (अंधेरे पखवाड़े का 14वां चंद्र दिवस) को पड़ती है।

  • अमांत पद्धति: माघ कृष्ण चतुर्दशी (क्योंकि माघ का कृष्ण पक्ष अभी भी माघ माह का हिस्सा है)।
  • पूर्णिमांत पद्धति: फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी (क्योंकि पूर्णिमांत में यह कृष्ण पक्ष अगले माह, फाल्गुन, से संबंधित होता है)।

एक ही दिन। एक ही तिथि। एक ही त्योहार। अलग माह का नाम।

एक और उदाहरण: जन्माष्टमी

कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद के कृष्ण पक्ष अष्टमी पर पड़ती है।

  • अमांत में: श्रावण कृष्ण अष्टमी।
  • पूर्णिमांत में: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी।

फिर से — वास्तविक तारीख और तिथि समान है। केवल माह का नामकरण भिन्न है।

शास्त्रीय आधार

सूर्य सिद्धांत

सूर्य सिद्धांत, भारतीय परंपरा के सबसे प्राचीन और प्रामाणिक खगोलीय ग्रंथों में से एक है। इसमें चंद्र मास, तिथि, तथा सूर्य और चंद्रमा की गतियों की गणना के विस्तृत तरीके वर्णित हैं। अमांत और पूर्णिमांत दोनों गणना पद्धतियां इस ग्रंथ में दिए गए मूलभूत गणित से निकली हैं।

वेदांग ज्योतिष

वेदांग ज्योतिष — जो ऋषि लगध (लगभग 1400 ई.पू.) को समर्पित है — भारतीय खगोलीय गणनाओं का सबसे प्राचीन ज्ञात ग्रंथ है। यह एक वेदांग (वेदों का अंग) है और चंद्र-सूर्य पंचांग की मूल संरचना को स्थापित करता है, जिसमें दो पक्षों में विभाजित चंद्र मास की अवधारणा शामिल है।

अर्थशास्त्र

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राजस्व और प्रशासनिक पंचांगों के संदर्भ में अमांत और पूर्णिमांत दोनों गणनाओं का उल्लेख है, जो यह दर्शाता है कि मौर्य काल (चौथी शताब्दी ई.पू.) में दोनों पद्धतियां स्थापित और समानांतर उपयोग में थीं।

पौराणिक संदर्भ

विष्णु पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में माह के शुक्ल और कृष्ण पक्षों में विभाजन का वर्णन है। अधिक मास (intercalary month) की अवधारणा — जो चंद्र वर्ष (~354 दिन) को सौर वर्ष (~365 दिन) के साथ समन्वयित करने के लिए हर 32-33 माह में जोड़ा जाता है — पौराणिक साहित्य और सूर्य सिद्धांत में भी समझाई गई है।

दो पद्धतियां क्यों हैं?

दोनों पद्धतियां खगोलीय रूप से वैध हैं — वे बस चंद्रमा की अलग-अलग कला से माह की गणना शुरू करती हैं। ऐतिहासिक रूप से, विभिन्न राजदरबारों, क्षेत्रीय परंपराओं और सिद्धांत टीकाकारों ने एक या दूसरी पद्धति अपनाई।

शालिवाहन शक (दक्षिण और पश्चिम भारत) ने अमांत गणना अपनाई, जबकि विक्रम संवत (उत्तर भारत) ने पूर्णिमांत गणना अपनाई। सदियों में, ये क्षेत्रीय परंपराएं बन गईं।

आधुनिक भारतविद्या (Indology) साहित्य में जब तक अन्यथा न कहा जाए, पूर्णिमांत पद्धति को डिफ़ॉल्ट माना जाता है, लेकिन दोनों समान रूप से प्रामाणिक हैं।

संक्षिप्त तुलना

अमांत (अमावस्यान्त):

  • माह समाप्ति: अमावस्या (नवचंद्र)
  • पहला पखवाड़ा: शुक्ल पक्ष
  • संवत: शालिवाहन शक (78 ई.)
  • क्षेत्र: गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा
  • नव वर्ष: चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा / उगादी)

पूर्णिमांत (पूर्णिमान्त):

  • माह समाप्ति: पूर्णिमा (पूर्ण चंद्र)
  • पहला पखवाड़ा: कृष्ण पक्ष
  • संवत: विक्रम संवत (57 ई.पू.)
  • क्षेत्र: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड
  • नव वर्ष: चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (अमांत नव वर्ष के समान दिन)

मुहूर्तम् इसे कैसे संभालता है

**मुहूर्तम्* पर, सभी पंचांग गणनाएं तिथि-आधारित और स्थान-सजग हैं। चाहे आप अमांत या पूर्णिमांत परंपरा का पालन करें, आपके शहर के लिए प्रदर्शित तिथि, नक्षत्र, योग और करण खगोलीय रूप से सटीक और दोनों पद्धतियों में समान हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: क्या दोनों पद्धतियों में त्योहार अलग-अलग दिनों पर पड़ते हैं?

उत्तर: नहीं। प्रत्येक त्योहार की तिथि (चंद्र दिवस) समान होती है। केवल कृष्ण पक्ष में पड़ने वाले त्योहारों के माह का नाम* भिन्न हो सकता है।

प्रश्न: कौन सी पद्धति अधिक सही है?

उत्तर: कोई भी नहीं — दोनों समान रूप से वैध और शास्त्र-सम्मत हैं। ये एक ही चंद्र चक्र के नामकरण के दो तरीके हैं।

प्रश्न: क्या इसका मुहूर्त गणना पर प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: नहीं। मुहूर्त का समय खगोलीय स्थितियों (तिथि, नक्षत्र, योग) पर आधारित होता है, जो अमांत/पूर्णिमांत नामकरण से स्वतंत्र है।

प्रश्न: मैं महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश शिफ्ट हुआ/हुई। मुझे कौन सी पद्धति अपनानी चाहिए?

उत्तर: आप कोई भी अपना सकते हैं — अंतर्निहित खगोल विज्ञान समान है। अधिकांश लोग अपने निवास क्षेत्र की परंपरा अपनाते हैं, लेकिन यह व्यक्तिगत और पारिवारिक परंपरा का विषय है।

प्रश्न: तमिलनाडु, केरल और बंगाल के सौर पंचांग के बारे में क्या?

उत्तर: ये राज्य मुख्य रूप से सौर पंचांग (जहां माह की सीमाएं सूर्य की राशि संक्रमण से निर्धारित होती हैं) का पालन करते हैं, चंद्र मास पद्धतियों का नहीं। अमांत/पूर्णिमांत का अंतर सौर पंचांगों पर सीधे लागू नहीं होता।


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