Muhuratam

મુહૂર્તમ

દશામાતા વ્રત કથા

પરિવારની શાંતિ, સુરક્ષા અને સ્થિરતા માટે દશામાતા વ્રતની સંપૂર્ણ કથા, સરળ વિધિ અને આધ્યાત્મિક ભાવ.

राजा नल और रानी दमयंती की दशामाता व्रत कथा

कथा के अनुसार प्राचीन समय में राजा नल और रानी दमयंती सुख-संपन्न राज्य करते थे। राज्य में समृद्धि और शांति थी।

होली दसा के दिन एक ब्राह्मणी ने रानी दमयंती को दशामाता का पवित्र डोरा दिया। रानी ने विधि से पूजन करके वह डोरा धारण किया।

कुछ दिन बाद राजा नल ने उस डोरे का महत्व समझे बिना उसे तोड़कर फेंक दिया। उसी रात माता दशामाता वृद्धा रूप में स्वप्न में प्रकट हुईं और चेतावनी दी कि अपमान के कारण शुभ दशा समाप्त होगी।

इसके बाद नल-दमयंती पर विपत्तियां आने लगीं। राज्य, वैभव और सुख छिन गया; उन्हें कष्टमय जीवन और भटकन सहनी पड़ी। कई कथनों में उन पर झूठे आरोप और अपमान का प्रसंग भी आता है।

राजा नल ने अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा मांगी। फिर चैत्र कृष्ण दशमी पर नल-दमयंती ने श्रद्धा से दशामाता व्रत, पीपल पूजन, डोरा-विधि और कथा-श्रवण किया। माता की कृपा से उनकी दशा बदली और राज्य-सुख पुनः प्राप्त हुआ।

दशामाता और दयाड़ा बावजी की व्रत कथा

एक बार दशामाता बावजी जंगल में जाते और चौपड़ बिछाते हैं। तो दयाड़ा बावजी और दशामाता बोले कि चौपड़ तो खेले मगर अपने हार–जीत की साख कौन भरेगा। तभी जंगल से एक ब्राह्मण गुजरता नजर आया। दोनों ने उसको आवाज लगाई कि ब्राह्मण तुम हमारे हार–जीत की साख भरोगे क्या? तो ब्राह्मण बोला, हाँ महाराज।मैं साख भरूँगा।

दशामाता और दयाड़ा बावजी खेलने लगे। खेल में दयाड़ा बावजी जीत गए मगर ब्राह्मण ने सोचा कि जीते तो दयाड़ा बावजी है पर इनकी जीत बताऊँगा तो मुझे केवल भस्मी मिलेगी और माताजी की जीत बताऊँगा तो कुछ तो मिलेगा। तो उसने झूठी साख भर दी कि आप दोनों में माताजी जीती है। तो दयाड़ा बावजी ने कहा ब्राह्मण ध्यान से बोल रहे हो कहीं झूठ तो नहीं। ब्राह्मण बोला नहीं महाराज मेरे से कोई चूक नहीं हुई।

तब माताजी ने अपनी अंगुली में से हीरे की अंगूठी उतार कर ब्राह्मण को दे दी। ब्राह्मण अंगूठी लेकर खुश हो गया। रास्ते में एक तालाब आया तो उसने सोचा थोड़ी देर विश्राम कर लूँ और स्नान ध्यान भी कर लूँ। यह सोच कर अंगूठी वहीं तालाब की पाल पर रख दी तभी एक मछली आई और अंगूठी ले गई। ब्राह्मण अंगूठी न पाकर दुखी हो घर चला गया।

अगले दिन ब्राह्मण जंगल से गुजर रहा था तो फिर उसे दशामाता और दयाड़ा बावजी मिले। फिर साख भरने के लिए कहा और उसने फिर हाँ कर दी। इस बार भी उसने झूठ में माताजी को जीता दिया और माताजी ने प्रसन्न हो उसे हाथ का कंगन निकाल कर दे दिया। कंगन लेकर वह घर गया और ताक में रख दिया तभी पड़ोसन किसी काम से वहाँ आई और कंगन उठा कर ले गई। इस तरह दो दिन और हो गये वह रोजाना झूठी साख भरता और जो कुछ उसे मिलता वह गायब हो जाता। इधर उसकी पत्नी भी उससे कहने लगी कि आजकल क्या करती हो पहले तो कुछ न कुछ भिक्षा ही ले आते थे। अब तो आज कल कुछ भी न लाते और न कहीं जाते हो घर में खाने के लिए अन्न के दाने तक नहीं बचे।

तब वह अपनी पत्नी को सारी बात बताता है कि मैं जंगल से गुजर रहा था तो रास्ते में मुझे दशामाता और दयाड़ा बावजी मिले। दोनों ने मुझसे हार–जीत की साख भरवाई परन्तु मैं रोजाना झूठ बोलकर माताजी को जिताता और पिताजी की हार बताता। तब उसकी पत्नी सारी बात समझ गई और कहने लगी कि अब आज से पिताजी को जिताना।

तब से वह ब्राह्मण सच्चा हुआ और उसने वैसा ही किया जैसा उसकी पत्नी ने कहा। पर दयाड़ा बावजी हँसने लगे कि आज तो ब्राह्मण झूठ बोल रहा है। इस पर ब्राह्मण बोला नहीं बावजी मैंने कोई गलती नहीं की। तब दयाड़ा बावजी ने उसकी झोली में भरसी डाल दी। वह मन में दुखी हुआ कि पत्नी की बात मानकर मैंने पिताजी को जीता तो दिया पर उन्होंने तो मुझे यह भरसी दी।

अब आज पत्नी को जाकर क्या कहूँगा। ऐसा सोचते हुए वह गया और जाकर उस भरसी को एक कोने में डाल दी। अगले दिन ब्राह्मण मंदिर में जाकर बैठ गया की आज तो पत्नी आएगी और डाटेगी।इधर पत्नी घर में आती है और देखती है कि घर तो हीरे–मोती से जगमगा रहा है तो वह दंग रह जाती है। बाजार से बहुत सारा खाने–पीने का सामान, नए–नए कपड़े, गहने आदि बनवाती है और तरह–तरह के भोजन बनाती है।

इधर ब्राह्मण मन ही मन बहुत घबरा रहा था तभी उसके बच्चे उसे बुलाने आते हैं कि बापू मां घर बुला रही है। वह डरता–डरता कहता है कि हाँ तुम चलो मैं आ रहा हूँ। और वह घर जाता है घर जाकर देखता है कि घर में तो बहुत अन्न धन हो गया। तब सभी खुशी–खुशी भोजन करने लगते हैं। तभी पड़ोसन वहाँ आती है और कहती है कि और आजकल तुम्हारे पास कितना धन हो गया कि मैं ये कंगन कब से ले गई और तुम्हें याद भी नहीं है। उधर ब्राह्मण संध्या आरती पर तालाब के किनारे गया और स्नान करने के लिए तालाब में उतरा कि एक मछली किनारे पर अंगूठी डाल रही थी। वह देख कर खुश हुआ और हीरे की अंगूठी ले घर गया।

तब उसने कहा कि यह तो दशामाता दयाड़ा बावजी का दिया हुआ सब कुछ है। तब उसकी पत्नी कहती है कि आगे से भी ध्यान रखना कि आदमी का कमाया फलता है। दशामाता दयाड़ा बावजी जैसा उस ब्राह्मण को फल दिया वैसा सभी को देना।

दशामाता व्रत की सरल विधि

  1. प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और शांत पूजा-स्थान तैयार करें।
  2. कच्चे सूत का डोरा बनाएं (परंपरानुसार 10 तार और 10 गांठें) और पूजा में स्थापित करें।
  3. माता दशामाता को कुमकुम, अक्षत, पुष्प, दीप, धूप और सात्त्विक नैवेद्य अर्पित करें।
  4. पीपल पूजन और परिक्रमा करें (अनेक परंपराओं में 10 परिक्रमा की जाती हैं)।
  5. राजा नल-दमयंती वाली दशामाता व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  6. आरती करके परिवार की स्थिरता के लिए प्रार्थना करें और प्रसाद वितरित करें।

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